हरिवंशराय बच्चन

हरिवंशराय बच्चन

1907-2003
हरिवंशराय बच्चन हिन्दी के प्रसिद्ध कवि थे, जिनकी कृति "मधुशाला" आधुनिक हिन्दी कविता की सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाओं में से एक है।
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Famous Works

वृक्ष हों भले खड़े,हों घने हों बड़े,
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।मैं जगत के ताप से डरता नहीं अब,
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।है कंहा वह आग जो मुझको जलाए,
आज मुझसे बोल, बादल!तम भरा तू, तम भरा मैं,
हम ऐसे आज़ाद हमारा झंडा है बादलचांदी, सोने, हीरे मोती से सजती गुड़िया
मुझे न अपने से कुछ प्यार,मिट्टी का हूँ, छोटा दीपक,
प्यार किसी को करना लेकिनकह कर उसे बताना क्या
इतने मत उन्‍मत्‍त बनो!जीवन मधुशाला से मधु पी
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!यह चाँद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का,
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,उस पार न जाने क्या होगा!
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।इन जंजीरों की चर्चा में कितनों ने निज हाथ बँधाए,
मैनें चिड़िया से कहा, मैं तुम पर एककविता लिखना चाहता हूँ।
तट पर है तरुवर एकाकी,नौका है, सागर में,
सोचा करता बैठ अकेले,गत जीवन के सुख-दुख झेले,
कह रहा जग वासनामयहो रहा उद्गार मेरा!
सन्नाटा वसुधा पर छाया,नभ में हमनें कान लगाया,
अगर तुम्हारा मुकाबलादीवार से है,
उजला-उजला हंस एक दिनउड़ते-उड़ते आया,
देवों ने था जिसे बनाया,देवों ने था जिसे बजाया,
कोई पार नदी के गाता!भंग निशा की नीरवता कर,
संसृति के विस्तृत सागर मेंसपनों की नौका के अंदर
आक्षितिज फैली हुई मिट्टी निरन्तर पूछती है,कब कटेगा, बोल, तेरी चेतना का शाप,
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?क्या करूँ?
अगणित उन्मादों के क्षण हैं,अगणित अवसादों के क्षण हैं,
क्या है मेरी बारी में।जिसे सींचना था मधुजल से
आधे से ज़्यादा जीवनजी चुकने पर मैं सोच रहा हूँ-
ज़िन्दगी और ज़माने कीकशमकश से घबराकर
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
गर्म लोहा पीट, ठंडा पीटने को वक्त बहुतेरा पड़ा है।सख्त पंजा, नस कसी चौड़ी कलाई
चल मरदाने, सीना ताने,हाथ हिलाते, पाँव बढ़ाते,
चिड़िया, ओ चिड़िया,कहाँ है तेरा घर?
जाओ कल्पित साथी मन के!जब नयनों में सूनापन था,
[सुभाष बोस के प्रति]जीवन का दिन बीत चुका था,
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?::उठी ऐसी घटा नभ में
जो बीत गई सो बात गईजीवन में एक सितारा था