ग़ज़ल

क्यों जीता हूँ

हरिवंशराय बच्चन · सब कलाम देखें
आधे से ज़्यादा जीवनजी चुकने पर मैं सोच रहा हूँ-क्यों जीता हूँ?लेकिन एक सवाल अहमइससे भी ज़्यादा,क्यों मैं ऎसा सोच रहा हूँ?
संभवत: इसलिएकि जीवन कर्म नहीं है अबचिंतन है,काव्य नहीं है अबदर्शन है।
जबकि परीक्षाएँ देनी थींविजय प्राप्त करनी थीअजया के तन मन पर,सुन्दरता की ओर ललकना और ढलकनास्वाभाविक था।जबकि शत्रु की चुनौतियाँ बढ कर लेनी थी।जग के संघर्षों में अपनापित्ता पानी दिखलाना था,जबकि हृदय के बाढ़ बवंड़रऔ' दिमाग के बड़वानल कोशब्द बद्ध करना था,छंदो में गाना था,तब तो मैंने कभी न सोचाक्यों जीता हूँ?क्यों पागल साजीवन का कटु मधु पीता हूँ?
आज दब गया है बड़वानल,और बवंडर शांत हो गया,बाढ हट गई,उम्र कट गई,सपने-सा लगता बीता है,आज बड़ा रीता रीता हैकल शायद इससे ज्यादा होअब तकिये के तलेउमर ख़ैय्याम नहीं है,जन गीता है।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh