ग़ज़ल
आत्मदीप
मुझे न अपने से कुछ प्यार,मिट्टी का हूँ, छोटा दीपक,ज्योति चाहती, दुनिया जब तक,मेरी, जल-जल कर मैं उसको देने को तैयार
पर यदि मेरी लौ के द्वार,दुनिया की आँखों को निद्रित,चकाचौध करते हों छिद्रितमुझे बुझा दे बुझ जाने से मुझे नहीं इंकार
केवल इतना ले वह जानमिट्टी के दीपों के अंतरमुझमें दिया प्रकृति ने है करमैं सजीव दीपक हूँ मुझ में भरा हुआ है मान
पहले कर ले खूब विचारतब वह मुझ पर हाथ बढ़ाएकहीं न पीछे से पछताएबुझा मुझे फिर जला सकेगी नहीं दूसरी बार
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh