ग़ज़ल
क्या है मेरी बारी में
क्या है मेरी बारी में।
जिसे सींचना था मधुजल सेसींचा खारे पानी से,नहीं उपजता कुछ भी ऐसीविधि से जीवन-क्यारी में।क्या है मेरी बारी में।
आंसू-जल से सींच-सींचकरबेलि विवश हो बोता हूं,स्रष्टा का क्या अर्थ छिपा हैमेरी इस लाचारी में।क्या है मेरी बारी में।
टूट पडे मधुऋतु मधुवन मेंकल ही तो क्या मेरा है,जीवन बीत गया सब मेराजीने की तैयारी में|क्या है मेरी बारी में
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