ग़ज़ल

गर्म लोहा

हरिवंशराय बच्चन · सब कलाम देखें
गर्म लोहा पीट, ठंडा पीटने को वक्त बहुतेरा पड़ा है।सख्त पंजा, नस कसी चौड़ी कलाईऔर बल्लेदार बाहें,और आँखें लाल चिंगारी सरीखी,चुस्त औ तीखी निगाहें,हाथ में घन, और दो लोहे निहाईपर धरे तू देखता क्या?गर्म लोहा पीट, ठंडा पीटने को वक्त बहुतेरा पड़ा है।
भीग उठता है पसीने से नहाताएक से जो जूझता है,ज़ोम में तुझको जवानी के न जानेखब्त क्या क्या सूझता है,या किसी नभ देवता नें ध्येय से कुछफेर दी यों बुद्धि तेरी,कुछ बड़ा, तुझको बनाना है कि तेरा इम्तहाँ होता कड़ा है।गर्म लोहा पीट, ठंडा पीटने को वक्त बहुतेरा पड़ा है।
एक गज छाती मगर सौ गज बराबरहौसला उसमें, सही है;कान करनी चाहिए जो कुछतजुर्बेकार लोगों ने कही है;स्वप्न से लड़ स्वप्न की ही शक्ल में हैलौह के टुकड़े बदलतेलौह का वह ठोस बनकर है निकलता, जो कि लोहे से लड़ा है।गर्म लोहा पीट, ठंडा पीटने को वक्त बहुतेरा पड़ा है।
घन- हथौड़े और तौले हाथ की देचोट, अब तलवार गढ़ तूऔर है किस चीज की तुझको भविष्यतमाँग करता आज पढ़ तू,औ, अमित संतान को अपनी थमा जाधारवाली यह धरोहरवह अजित संसार में है शब्द का खर खड्ग लेकर जो खड़ा है।गर्म लोहा पीट, ठंडा पीटने को वक्त बहुतेरा पड़ा है।-0-
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