गोस्वामी तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास

1511-1623
गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के सूर्य और रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि माने जाते हैं। उनकी अमर रचना 'रामचरितमानस' ने भारतीय जनमानस में मर्यादा, धर्म और भक्ति के आदर्शों को गहराई से स्थापित किया। तुलसीदास जी की चौपाइयाँ और दोहे सदियों से भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का अभिन्न अंग बने हुए हैं।
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Famous Works

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।नवकंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं॥
अब लौं नसानी, अब न नसैहौं।राम-कृपाँ भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं॥
अवधेस के द्वारे सकारे गई सुत गोद कै भूपति लै निकसे।अवलोकि हौं सोच बिमोचन को ठगि-सी रही, जे न ठगे धिक-से॥
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजियार॥
बाल समय रबि भक्षि लियो तब, तीनहुँ लोक भयो अँधियारो।ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो।
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
मंगल भवन अमंगल हारी।द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी॥
आकर चारि लाख चौरासी।जाति जीव जल थल नभ बासी॥
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही।मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
एसी मूढता या मन की।परिहरि रामभगति-सुरसरिता, आस करत ओसकन की।
और काहि माँगिये, को मागिबो निवारै।अभिमत दातार कौन, दुख-दरिद्र दारै॥
कब देखौंगी नयन वह मधुर मूरति ?राजिवदल-नयन, कोमल-कृपा-अयन,
कलि नाम काम तरु रामको।दलनिहार दारिद दुकाल दुख, दोष गोर घन घामको॥१॥
काहे ते हरि मोहिं बिसारो।जानत निज महिमा मेरे अघ, तदपि न नाथ सँभारो॥१॥
केशव , कहि न जाइ का कहिये ।देखत तव रचना विचित्र अति ,समुझि मनहिमन रहिये ।
कौन जतन बिनती करिये।निज आचरन बिचारि हारि हिय, मानि-जानि डरिये॥१॥
जागिये कृपानिधान जानराय, रामचन्द्र!जननी कहै बार-बार, भोर भयो प्यारे॥
जानकी जीवन की बलि जैहों।चित कहै, राम सीय पद परिहरि अब न कहूँ चलि जैहों॥१॥
जो मन लागै रामचरन अस।देह गेह सुत बित कलत्र महँ मगन होत बिनु जतन किये जस॥
जो मोहि राम लागते मीठे।तौ नवरस, षटरस-रस अनरस ह्वै जाते सब सीठे॥१॥
जौ पै जिय धरिहौ अवगुन ज़नके।तौ क्यों कट सुकृत नखते मो पै, बिपुल बृदं अघ बनके॥१॥
तऊ न मेरे अघ अवगुन गनिहैं।जौ जमराज काज सब परिहरि इहै ख्याल उर अनिहैं॥१॥
तन की दुति स्याम सरोरुह लोचन कंज की मंजुलताई हरैं।अति सुन्दर सोहत धूरि भरे छबि भूरि अनंग की दूरि धरैं।
ताहि ते आयो सरन सबेरे।ग्यान बिराग भगति साधन कछु सपनेहुँ नाथ न मेरे॥१॥
तुलसी अपने राम को, भजन करौ निरसंकआदि अन्त निरबाहिवो जैसे नौ को अंक ।।
ते नर नरकरूप जीवत जग,भव-भंजन पद बिमुख अभागी।
दीन-हित बिरद पुराननि गायो।आरत-बन्धु, कृपालु मृदुलचित जानि सरन हौं आयो॥१॥
दूल्ह राम, सीय दुलही री।घन-दामिन-बर बरन, हरन-मन सुन्दरता नख-शिख निबही री॥
देव! दूसरो कौन दीनको दयालु।सीलनिधान सुजान-सिरोमनि,
सुभग सरासन सायक जोरे॥खेलत राम फिरत मृगया बन, बसति सो मृदु मूरति मन मोरे॥
नाहिन भजिबे जोग बियो।श्रीरघुबीर समान आन को पूरन कृपा हियो॥
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== बजरंग बाण ==निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करें सनमान ।
बिनती भरत करत कर जोरे।दिनबन्धु दीनता दीनकी कबहुँ परै जनि भोरे॥१॥
भज मन रामचरन सुखदाई॥ध्रु०॥जिहि चरननसे निकसी सुरसरि संकर जटा समाई।
भरोसो जाहि दूसरो सो करो।मोको तो रामको नाम कलपतरु, कलिकल्यान फरो॥१॥
भाई! हौं अवध कहा रहि लैहौं।राम-लकन-सिय-चरन बिलोकन काल्हि काननहिं जैहौं॥
मन माधवको नेकु निहारहि।सुनु सथ, सदा रंककेधन ज्यों, छिन-छिन प्रभुहिं सँभारहि॥
मनोरथ मनको एकै भाँति।चाहत मुनि-मन-अगम सुकृति-फल, मनसा अघ न अघाति॥१॥
मनोहरताको मानो ऐन।स्यामल गौर किसोर पथिक दोउ सुमुखि! निरखि भरि नैन॥
ममता तू न गई मेरे मन तें॥पाके केस जनमके साथी, लाज गई लोकनतें।
माधव! मो समान जग माहीं।सब बिधि हीन मलीन दीन अति बिषय कोउ नाहीं॥१॥
माधव, मोह-पास क्यों छूटै।बाहर कोट उपाय करिय अभ्यंतर ग्रन्थि न छूटै॥१॥