ग़ज़ल

जौ पै जिय धरिहौ अवगुन ज़नके

गोस्वामी तुलसीदास · सब कलाम देखें
जौ पै जिय धरिहौ अवगुन ज़नके।तौ क्यों कट सुकृत नखते मो पै, बिपुल बृदं अघ बनके॥१॥कहिहैं कौन कलुष मेरे कृत, कर्म बचन अरु मनके।हारिहैं अमित सेष सारद-स्त्रुति, गिनत एक इक छनके॥२॥जो चित पड़्हे नाम महिमा निज, गुनगुन पावन पनके।तौ तुलसीहिं तारिहौ बिप्र ज्यों, दसन तोरि जम-गनके॥३॥
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