ग़ज़ल

बिनती भरत करत कर जोरे

गोस्वामी तुलसीदास · सब कलाम देखें
बिनती भरत करत कर जोरे।दिनबन्धु दीनता दीनकी कबहुँ परै जनि भोरे॥१॥तुम्हसे तुम्हहिं नाथ मोको, मोसे, जन तुम्हहि बहुतेरे।इहै जानि पहिचानि प्रीति छमिये अघ औगुन मेरे॥२॥यों कहि सीय-राम-पाँयन परि लखन लाइ उर लीन्हें।पुलक सरीर नीर भरि लोचन कहत प्रेम पन कीन्हें॥३॥तुलसी बीते अवधि प्रथम दिन जो रघुबीर न ऐहौ।तो प्रभु-चरन-सरोज-सपथ जीवत परिजनहि न पैहौ॥४॥
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