ग़ज़ल

भरोसो जाहि दूसरो सो करो

गोस्वामी तुलसीदास · सब कलाम देखें
भरोसो जाहि दूसरो सो करो।मोको तो रामको नाम कलपतरु, कलिकल्यान फरो॥१॥करम उपासन ग्यान बेदमत सो जब भाँति खरो।मोहिं तो सावनके अंधहि ज्यों, सूझत हरो-हरो॥२॥चाटत रहेउँ स्वान पातरि ज्यों कबहुँ न पेट भरो।सो हौं सुमिरत नाम-सुधारस, पेखत परुसि धरो॥३॥स्वारथ औ परमारथहूको, नहिं कुञ्जरो नरो।सुनियत सेतु पयोधि पषनन्हि, करि कपि कटक तरो॥४॥प्रीति प्रतीति जहाँ जाकी तहॅं, ताको काज सरो।मेर तो माय-बाप दोउ आखर, हौं सिसु-अरनि अरो॥५॥संकर साखि जो राखि कहउँ कछु, तौ जरि जीह गरो।अपनो भलो रामनामहिं ते, तुलसिहि समुझि परो॥६॥
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