ग़ज़ल
मन माधवको नेकु निहारहि
मन माधवको नेकु निहारहि।सुनु सथ, सदा रंककेधन ज्यों, छिन-छिन प्रभुहिं सँभारहि॥सोभा-सील ग्यान-गुन-मंदिर, सुंदर, परम उदारहि।रंजन संत,अखिल अघ गंजन, भंजन बिषय बिकारहि॥जो बिनु जोग, जग्य, ब्रत, संयम गयो चहै भव पारहि।तौ जनि तुलसीदास निसि बासर हरि-पद कमल बिसारहि॥
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