ग़ज़ल
ते नर नरकरूप जीवत जग
ते नर नरकरूप जीवत जग,भव-भंजन पद बिमुख अभागी।निसिबासर रुचि पाप, असुचिमन,खल मति मलिन निगम पथ त्यागी॥१॥नहिं सतसंग, भजन नहिं हरिको,स्त्रवन न रामकथा अनुरागी।सुत-बित-दार-भवन-ममता-निसि,सोवत अति न कबहुँ मति जागी॥२॥तुलसिदास हरि नाम सुधा तजि,सठ, हठि पियत बिषय-बिष मॉंगी।सूकर-स्वान-सृगाल-सरिस जन,
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