ग़ज़ल
दूल्ह राम
दूल्ह राम, सीय दुलही री।घन-दामिन-बर बरन, हरन-मन सुन्दरता नख-शिख निबही री॥ब्याह-विभूषन-बसन-बिभूषित, सखि-अवली लखि ठगि सी रही री॥जीवन-जनम-लाहु लोचन फल है इतनोइ, लह्यो आजु सही री॥सुखमा-सुरभि सिंगार-छीर दुहि, मयन अमिय मय कियो है दही री॥मथि माखन सिय राम सँवारे, सकल भुवन छवि मनहुँ मही री॥तुलसिदास जोरी देखत सुख सोभा, अतुल न जाति कही री॥रूप रासि बिरची बिरंची मनो, सिला लवनि रति काम लही री॥
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