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कवितावली (बालकाण्ड)
अवधेस के द्वारे सकारे गई सुत गोद कै भूपति लै निकसे।अवलोकि हौं सोच बिमोचन को ठगि-सी रही, जे न ठगे धिक-से॥तुलसी मन-रंजन रंजित-अंजन नैन सुखंजन-जातक-से।सजनी ससि में समसील उभै नवनील सरोरुह से बिकसे॥
पग नूपुर औ पहुँची करकंजनि मंजु बनी मनिमाल हिएँ।नवनील कलेवर पीत झँगा झलकै पुलकैं नृपु गोद लिएँ॥अरबिंद सो आननु रूप मरंदु अनंदित लोचन-भृंग पिएँ।मनमों न बस्यो अस बालकु जौं तुलसी जग में फलु कौन जिएँ॥