फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
1911-1984
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एक क्रांतिकारी शायर थे और प्रगतिशील लेखक संघ के प्रमुख सदस्य थे।
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
तुम न आये थे तो हर चीज़ वही थी कि जो है
आसमां हद-ए-नज़र, राह-गुज़र राह-गुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय
अब कहाँ रस्म घर लुटाने की
बर्कतें थी शराबख़ाने की
अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सब की ज़ुबाँ ठहरी है
जो भी चल निकली है वो बात कहाँ ठहरी है
*
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आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिसने इस दिल को परीख़ाना बना रखा था
आइए हाथ उठाएँ हम भी
हम जिन्हें रस्मे-दुआ याद नहीं
आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफी नहीं
आज यूँ मौज-दर-मौज ग़म थम गया
इस तरह ग़मज़दों को क़रार आ गया
हम मुसाफिर युँही मसरूफे सफर जायेंगे,
बेनिशाँ हो गए जब शहर तो घर जायेंगे
राजे-उल्फत छुपा के देख लिया
दिल बहुत कुछ जला के देख लिया
आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
उस के बाद आए जो अज़ाब आए
इज्ज़े अहले-सितम की बात करो
इश्क़ के दम-क़दम की बात करो
इश्क़ मिन्नतकशे-क़रार नहीं
हुस्न मज़बूरे-इंतज़ार नहीं
इन्तेसाब
आज के नाम
वो जिसकी दीद में लाखों मसर्रतें पिन्हाँ
वो हुस्न जिसकी तमन्ना में जन्नतें पिन्हाँ
कई बार इसका दामन भर दिया हुस्ने-दो-आलम से
मगर दिल है कि उसकी खाना-वीरानी नहीं जाती
कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल, कब रात बसर होगी
सुनते थे वो आयेंगे, सुनते थे सहर होगी
कब तक दिल की ख़ैर मनायें, कब तक राह दिखाओगे
कब तक चैन की मोहलत दोगे, कब तक याद न आओगे
कब याद में तेरा साथ नहीं, कब हात में तेरा हात नहीं
सद शुक्र केः अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं
कभी कभी याद में उभरते हैं नक़्श-ए-माज़ी मिटे मिटे से
वो आज़माइश सी दिल-ओ-नज़र की, वो क़ुरबतें सी वो फ़ासले से
हमीं से अपनी नवा हमकलाम होती रही
ये तेग अपने लहू में नियाम होती रही
कहीं तो कारवाँ-ए-दर्द की मंज़िल ठहर जाए
किनारे आ लगे उम्र-ए-रवाँ या दिल ठहर जाए
क़र्ज़-ए-निगाह-ए-यार अदा कर चुके हैं हम
सब कुछ निसार-ए-राह-ए-वफ़ा कर चुके हैं हम
वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
कुछ दिन से इन्तज़ार-ए-सवाल-ए-दिगर में है
वो मुज़्महिल हया जो किसी की नज़र में है
कुछ पहले इन आँखों आगे क्या-क्या न नज़ारा गुज़रे था
क्या रौशन हो जाती थी गली जब यार हमारा गुज़रे था
कुछ मुहतसिबों की ख़िलवत में कुछ वाइज़ के घर जाती है
हम बादा-कशों के हिस्से को अब जाम में कम-कम आती है
याद की राहगुज़र जिसपे इसी सूरत से
मुद्दतें बीत गयीं हैं तुम्हें चलते-चलते
मेरी तेरी निगाह में जो लाख इंतज़ार हैं
जो मेरे तेरे तन-बदन में लाख दिल फ़िग़ार हैं
ख़ुदा वो वक़्त न लाये कि सोग़वार हो तू
सुकूँ की नींद तुझे भी हराम हो जाये
आज के दिन न पूछो मेरे दोस्तो
दूर कितने हैं ख़ुशियाँ मनाने के दिन
इस वक़्त तो यूँ लगता है अब कुछ भी नहीं है
महताब न सूरज न अँधेरा न सवेरा
गरानी-ए-शबे-हिज़्रां दुचंद क्या करते
इलाजे-दर्द तेरे दर्दमन्द क्या करते
गर्मी-ए-शौक़-ए-नज़्ज़ारा का असर तो देखो
गुल खिले जाते हैं वो साया-ए-दर तो देखो