ग़ज़ल

ख़्वाब-बसेरा - इस वक़्त तो यूँ लगता है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ · सब कलाम देखें
इस वक़्त तो यूँ लगता है अब कुछ भी नहीं हैमहताब न सूरज न अँधेरा न सवेरा
आँखों के दरीचे में किसी हुस्न की झलकनऔर दिल की पनाहों में किसी दर्द का डेरा
मुम्किन है कोई वहम हो मुम्किन है सुना होगलियों में किसी चाप का एक आख़िरी फेरा
शाख़ों में ख़्यालों के घने पेड़ की शायदअब आके करेगा न कोई ख़्वाब बसेरा
इक बैर न इक महर न इक रब्त न रिश्तातेरा कोई अपना न पराया कोई मेरा
माना कि ये सुन-सान घड़ी सख़्त बड़ी हैलेकिन मेरे दिल ये तो फ़क़त एक घ।दी हैहिम्मत करो जीने को अभी उम्र पड़ी है
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