ग़ज़ल

कभी हयात कभी मय हराम होती रही

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ · सब कलाम देखें
हमीं से अपनी नवा हमकलाम होती रहीये तेग अपने लहू में नियाम होती रही
मुक़ाबिल-ए-सफ़-ए-आदा जिसे किया आगाज़वो: जंग अपने ही हिल में तमाम होती रही
कोई मसीहा न ईफ़ा-ए-अहद को पहुँचाबहुत तलाश पस-ए-क़त्ल-ए-आम होती रही
ये बरहमन का करम, वो अता-ए-शेख-ए-हरमकभी हयात कभी मय हराम होती रही
जो कुछ भी बन न पड़ा 'फैज़' लूट के यारों सेतो रहज़नों से दुआ-ओ-सलाम होती रही.
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