ग़ज़ल
आइए हाथ उठाएँ हम भी
आइए हाथ उठाएँ हम भीहम जिन्हें रस्मे-दुआ याद नहींहम जिन्हें सोज़े-मुहब्बत के सिवाकोई बुत, कोई ख़ुदा याद नहीं
आइए अर्ज़ गुज़ारें कि निगारे-हस्तीज़हरे-इमरोज़ में शीरीनी-ए-फ़र्दां भर देवो जिन्हें ताबे गराँबारी-ए-अय्याम नहींउनकी पलकों पे शबो-रोज़ को हल्का कर दे
जिनकी आँखों को रुख़े-सुब्हे का यारा भी नहींउनकी रातों में कोई शम्म'अ मुनव्वर कर देजिनके क़दमों को किसी रह का सहारा भी नहींउनकी नज़रों पे कोई राह उजागर कर दे
जिनका दीं पैरवी-ए-कज़्बो-रिया है उनकोहिम्मते-कुफ़्र मिले, ज़ुर्रते-तहक़ीक़ मिलेजिनके सर मुंतज़िरे-तेग़े-जफ़ा हैं उनकोदस्ते-क़ातिल को झटक देने की तौफ़ीक़ मिले
इश्क़ का सर्रे-निहाँ जान-तपाँ है जिससेआज इक़रार करें और तपिश मिट जाएहर्फ़े-हक़ दिल में खटकता है जो काँटे की तरहआज इज़हार करें और ख़लिश मिट जाए
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