ग़ज़ल
आने वालों से कहो हम तो गुज़र जायेंगे
हम मुसाफिर युँही मसरूफे सफर जायेंगे,बेनिशाँ हो गए जब शहर तो घर जायेंगे
किस कदर होगा यहाँ मेहर-ओ-वफा का मातमहम तेरी याद से जिस रोज़ उतर जायेंगे
जौहरी बंद किये जाते हैं बाज़ारे-सुखन,हम किसे बेचने अलमास-ओ-गुहर जायेंगे
शायद अपना ही कोई बैत, हुदी-खवाँ बनकरसाथ जायेगा मेरे यार जिधर जायेंगे
"फैज़" आते हैं राहे-इशक में जो सखत मकाम,आने वालों से कहो हम तो गुज़र जायेंगे...........
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