ग़ज़ल
कुछ दिन से इन्तज़ार-ए-सवाल-ए-दिगर में है
कुछ दिन से इन्तज़ार-ए-सवाल-ए-दिगर में हैवो मुज़्महिल हया जो किसी की नज़र में है
सीखी यहीं मेरे दिल-ए-काफ़िर ने बन्दगीरब्ब-ए-करीम है तो तेरी रहगुज़र में है
माज़ी में जो मज़ा मेरी शाम-ओ-सहर में थाअब वो फ़क़त तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में है
क्या जाने किस को किस से है अब दाद की तलबवो ग़म जो मेरे दिल में है तेरी नज़र में है
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