ग़ज़ल
गर्मी-ए-शौक़-ए-नज़्ज़ारा का असर तो देखो
गर्मी-ए-शौक़-ए-नज़्ज़ारा का असर तो देखोगुल खिले जाते हैं वो साया-ए-दर तो देखो
ऐसे नादाँ तो न थे जाँ से गुज़रनेवालेनासिहो, रहबर-ओ-राहगुज़र तो देखो
वो तो वो हैं तुम्हें हो जायेगी उल्फ़त मुझसेएक नज़र तुम मेरा महबूब-ए-नज़र तो देखो
वो जो अब चाक गरेबाँ भी नहीं करते हैंदेखनेवालो कभी उन का जिगर तो देखो
दामन-ए-दर्द को गुलज़ार बना रखा हैआओ एक दिन दिल-ए-पुरख़ूँ का हुनर तो देखो
सुबह की तरह झमकता है शब-ए-ग़म का उफ़क़"फ़ैज़" ताबिंदगी-ए-दीदा-ए-तर तो देखो
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh