अल्लामा इक़बाल

अल्लामा इक़बाल

1877-1938
मुहम्मद इक़बाल, जिन्हें अल्लामा इक़बाल के नाम से जाना जाता है, एक दार्शनिक और शायर थे।
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Famous Works

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरीज़िन्दगी शम्अ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँ
अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहाभूले-भटके की रहनुमा हूँ मैं
अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरामुझे फ़िक्र-ए-जहाँ क्यूँ हो जहाँ तेरा है या मेरा
अजब वाइज़ की दीन-दारी है या रबअदावत है इसे सारे जहाँ से
अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैंये आशिक़ कौन-सी बस्ती के यारब रहने वाले हैं
अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैंआब ओ गिल के खेल को अपना जहाँ समझा था मैं
असर करे न करे सुन तो ले मेरी फ़रियादनहीं है दाद का तालिब ये बंद-ए-आज़ाद
उस क़यूम को शमशीर की हाजत नहीं रहतीहो जिसके जवानों की ख़ुदी सूरत-ए-फ़ौलाद
आता है याद मुझको गुज़रा हुआ ज़मानावो बाग़ की बहारें, वो सब का चह-चहाना
आम मशरिक़ के मुसलमानों का दिल मगरिब में जा अटका हैवहाँ कुंतर सब बिल्लोरी है, यहाँ एक पुराना मटका है
इल्म ने मुझ से कहा इश्क़ है दीवानापनइश्क़ ने मुझ से कहा इल्म है तख़मीन-ओ-ज़ाँ
उक़ाबीशान से झपटे थे जो बे-बालो-परनिकलेसितारे शाम को ख़ूने-फ़लक़में डूबकर निकले
दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रबक्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुन्तज़र! नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ मेंके हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं तेरी जबीन-ए-नियाज़ में
क्या कहूँ अपने चमन से मैं जुदा क्योंकर हुआऔर असीरे-हल्क़ा-ए-दामे-हवा क्योंकर हुआ
ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहींतेरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं
ख़िरदमन्दोंसे क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या हैकि मैं इस फ़िक्र में रहता हूँ मेरी इंतिहा क्या है
उट्ठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दोख़ाक-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दो
ज़माना आया है बेहिजाबी का, आम दीदार-ए-यार होगासुकूत था परदादार जिसका वो राज़ अब आशकार होगा ।
ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र ओ नाज़ नहींजे नाज़ हो भी तो बे-लज़्ज़त-ए-नियाज नहीं
जहाने-ताज़ा की अफ़कारे-ताज़ा से है नमूदकि संगो-ख़िश्त से होते नहीं जहाँ पैदा
गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बू न बेगानावार देखहै देखने की चीज़ इसे बार बार देख
गेसू-ए- ताबदार को और भी ताबदार करहोश-ओ-ख़िराद शिकर कर क़ल्ब-ओ-नज़र शिकर कर
चमक तेरी अयाँ बिजली में आतिशमें शरारेमेंझलक तेरी हवेदाचाँद में सूरज में तारे में
चमने-ख़ार-ख़ार है दुनियाख़ूने-सद नौबहार है दुनिया
जब इश्क़ सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद-आगाहीखुलते हैं ग़ुलामों पर असरार-ए-शहंशाही
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है ।पर नहीं, ताकत-ए-परवाज़ मगर रखती है ।
ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ीन छूटे मुझ से लंदन में भी आदाब-ए-सहर-ख़ेज़ी
मुमकिन है के तु जिसको समझता है बहाराँऔरों की निगाहों में वो मौसम हो ख़िज़ाँ का
जिन्हें मैं ढूँढता था आस्मानों में ज़मीनों मेंवो निकले मेरे ज़ुल्मतख़ाना-ए-दिल के मकीनोंमें
सुनाऊँ तुम्हे बात एक रात की,कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,
डरते-डरते दमे-सहर से,तारे कहने लगे क़मर से ।
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमाराहम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलसिताँ हमारा
तस्कीन न हो जिस से वो राज़ बदल डालोजो राज़ न रख पाए हमराज़ बदल डालो
तू अभी रहगुज़र में है क़ैद-ए-मकाम से गुज़रमिस्र-ओ-हिजाज़ से गुज़र, पारेस-ओ-शाम से गुज़र