ग़ज़ल
जब इश्क़ सताता है आदाबे-ख़ुदागाही
जब इश्क़ सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद-आगाहीखुलते हैं ग़ुलामों पर असरार-ए-शहंशाही
'अत्तार' हो 'रूमी' हो 'राज़ी' हो 'ग़ज़ाली' होकुछ हाथ नहीं आता बे-आह-सहर-गाही
नौमीद न हो इन से ऐ रह-बर-ए-फ़रज़ानाकम-कोश तो हैं लेकिन बे-ज़ौक़ नहीं राही
ऐ ताएर-ए-लाहूती उस रिज़्क़ से मौत अच्छीजिस रिज़्क़ से आती हो परवाज़ में कोताही
दारा ओ सिकंदर से वो मर्द-ए-फ़क़ीर औलाहो जिसकी फ़क़ीरी में बू-ए-असदूल-लाही
आईन-ए-जवां मर्दां हक़-गोई ओ बे-बाकीअल्लाह के शेरों को आती नहीं रूबाही
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