ग़ज़ल
असरार-ए-पैदा
उस क़यूम को शमशीर की हाजत नहीं रहतीहो जिसके जवानों की ख़ुदी सूरत-ए-फ़ौलाद
नाचीज़ जहान-ए-मेह-ओ-परवीन तेरे आगेवोह आलम-ए-मजबूर है, तू आलम-ए-आज़ाद
मौजों की तपिश क्या है, फ़क़्त ज़ौक़-ए-तलब हैपिनहाँ जो सदफ़ में है, वो दौलत है ख़ुदाबाद
शाहीन कभी परवाज़ से थक कर नहीं गिरतापुर दम है अगर तू तो नहीं ख़तरा-ए-उफ़्फ़ाद
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