ग़ज़ल
ज़मीं-ओ-आसमाँ मुमकिन है
मुमकिन है के तु जिसको समझता है बहाराँऔरों की निगाहों में वो मौसम हो ख़िज़ाँ का
है सिल-सिला एहवाल का हर लहजा दगरगूँअए सालेक-रह फ़िक्र न कर सूदो-ज़याँ का
शायद के ज़मीँ है वो किसी और जहाँ कीतू जिसको समझता है फ़लक अपने जहाँ का
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