ग़ज़ल
उक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बालो-पर निकले
उक़ाबीशान से झपटे थे जो बे-बालो-परनिकलेसितारे शाम को ख़ूने-फ़लक़में डूबकर निकले
हुए मदफ़ूने-दरियाज़ेरे-दरियातैरने वालेतमाँचेमौज के खाते थे जो बनकर गुहर निकले
ग़ुबारे-रहगुज़रहैं कीमियापर नाज़ था जिनकोजबीनेंख़ाक पर रखते थे जो अक्सीरगर निकले
हमारा नर्म-रौ क़ासिदपयामे-ज़िन्दगीलायाख़बर देतीं थीं जिनको बिजलियाँ वोह बेख़बर निकले
जहाँ में अहले-ईमाँसूरते-ख़ुर्शीदजीते हैंइधर डूबे उधर निकले , उधर डूबे इधर निकले
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