ग़ज़ल
गेसू-ए- ताबदार को और भी ताबदार कर
गेसू-ए- ताबदार को और भी ताबदार करहोश-ओ-ख़िराद शिकर कर क़ल्ब-ओ-नज़र शिकर कर
तू है महीत-ए-बेकराँ मैं ज़रा सी आबजूया मुझे हम-किनार कर या मुझे बे-किनार कर
मैं हूँ सदफ़ तो तेरे हाथ मेरे गौहर की आबरूमैं हूँ ख़ज़फ़ तो तू मुझे गौहर-ए-शाहवार कर
नग़्मा-ए-नौबहार अगर मेरे नसीब में न होइस दम ए नीम सोज़ को ताइराक-ए-बहार कर
इश्क़ भी हो हिजाब में हुस्न भी हो हिजाब मेंया तू ख़ुद आशकार हो या मुझ को आशकार कर
बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्योँकार-ए-जहाँ दराज़ है अब मेरा इन्तज़ार कर
रोज़-ए-हिसाब जब पेश हो मेरा दफ़्तर-ए-अमलआप भी शर्मसार हो, मुझ को भी शर्मसार कर
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