ग़ज़ल
डरते-डरते दमे-सहर से
डरते-डरते दमे-सहर से,तारे कहने लगे क़मर से ।नज़्ज़ारे रहे वही फ़लक पर,हम थक भी गये चमक-चमक कर ।काम अपना है सुबह-ओ-शाम चलना,चलन, चलना, मुदाम चलना ।बेताब है इस जहां की हर शै,कहते हैं जिसे सकूं, नहीं है ।
होगा कभी ख़त्म यह सफ़र क्या ?मंज़िल कभी आयेगी नज़र क्या ?
कहने लगा चाँद, हमनशीनो !ऐ मज़रअ-ए-शब के खोशाचीनो !जुंबिश से है ज़िन्दगी जहां की,यह रस्म क़दीम है यहाँ की ।इस रह में मुक़ाम बेमहल है,पोशीदा क़रार में अज़ल है ।चलने वाले निकल गये हैं,जो ठहरे ज़रा, कुचल गये हैं ॥
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