सुभद्रा कुमारी चौहान
1904-1948
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
अपने बिखरे भावों का मैं
गूँथ अटपटा सा यह हार।
जब मैं आँगन में पहुँची,
पूजा का थाल सजाए।
इस तरह उपेक्षा मेरी,
क्यों करते हो मतवाले!
शैशव के सुन्दर प्रभात का
मैंने नव विकास देखा।
कठिन प्रयत्नों से सामग्री मैं बटोरकर लाई थी।
बड़ी उमंगों से मन्दिर में, पूजा करने आई थी॥
कड़ी आराधना करके बुलाया था उन्हें मैंने।
पदों को पूजने के ही लिए थी साधना मेरी॥
देखो कोयल काली है पर
मीठी है इसकी बोली
वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
‘‘गिरफ़्तार होने वाले हैं, आता है वारंट अभी॥’’
धक-सा हुआ हृदय, मैं सहमी, हुए विकल साशंक सभी॥
तुम मुझे पूछते हो ’जाऊँ’?
मैं क्या जवाब दूँ, तुम्हीं कहो!
लगे आने, हृदय धन से
कहा मैंने कि मत आओ।
मेरे भोले मूर्ख हृदय ने
कभी न इस पर किया विचार।
इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी |
जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ||
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
कर रहे प्रतीक्षा किसकी हैं
झिलमिल-झिलमिल तारे?
देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं
थी मेरा आदर्श बालपन से तुम मानिनि राधे!
तुम-सी बन जाने को मैंने व्रत नियमादिक साधे॥
यह मुरझाया हुआ फूल है, इसका हृदय दुखाना मत।
स्वयं बिखरनेवाली इसकी, पँखड़ियाँ बिखराना मत॥
सब दुखहरन सुखकर परम हे नीम! जब देखूँ तुझे।
तुहि जानकर अति लाभकारी हर्ष होता है मुझे॥
अभी अभी थी धूप, बरसने
लगा कहाँ से यह पानी
विफल प्रयत्न हुए सारे,
मैं हारी, निष्ठुरता जीती।
बिछा प्रतीक्षा-पथ पर चिंतित
नयनों के मदु मुक्ता-जाल।
प्रथम जब उनके दर्शन हुए,
हठीली आँखें अड़ ही गईं।
मैं अछूत हूँ, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है।
किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥
बहुत दिनों तक हुई परीक्षा
अब रूखा व्यवहार न हो।
डाल पर के मुरझाए फूल!
हृदय में मत कर वृथा गुमान।
कृष्ण-मंदिर में प्यारे बंधु
पधारो निर्भयता के साथ।
भैया कृष्ण! भेजती हूँ मैं राखी अपनी, यह लो आज।
कई बार जिसको भेजा है सजा-सजाकर नूतन साज॥
देवता थे वे, हुए दर्शन, अलौकिक रूप था।
देवता थे, मधुर सम्मोहन स्वरूप अनूप था॥
रीती होती जाती थी
जीवन की मधुमय प्याली।
वीणा बज-सी उठी, खुल गए नेत्र
और कुछ आया ध्यान।
यह मुरझाया हुआ फूल है,
इसका हृदय दुखाना मत।
जब अंतस्तल रोता है,
कैसे कुछ तुम्हें सुनाऊँ?
मैंने हँसना सीखा है
मैं नहीं जानती रोना;
बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥
मुझे कहा कविता लिखने को, लिखने मैं बैठी तत्काल।
पहिले लिखा- ‘‘जालियाँवाला’’, कहा कि ‘‘बस, हो गये निहाल॥’’
निर्धन हों धनवान, परिश्रम उनका धन हो।
निर्बल हों बलवान, सत्यमय उनका मन हो॥
हठीले मेरे भोले पथिक!
किधर जाते हो आकस्मात।
मेरे भोले सरल हृदय ने कभी न इस पर किया विचार-
विधि ने लिखी भाल पर मेरे सुख की घड़ियाँ दो ही चार!
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे॥
भैया कृष्ण ! भेजती हूँ मैं
राखी अपनी, यह लो आज।
बहिन आज फूली समाती न मन में।
तड़ित आज फूली समाती न घन में।।
तू गरजा, गरज भयंकर थी,
कुछ नहीं सुनाई देता था।
अपने काले अवगुंठन को
रजनी आज हटाना मत।
आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
दिन में प्रचंड रवि-किरणें
मुझको शीतल कर जातीं।
सोया था संयोग उसे
किस लिए जगाने आए हो?
सभा सभा का खेल आज हम
खेलेंगे जीजी आओ,