ग़ज़ल
उपेक्षा
इस तरह उपेक्षा मेरी,क्यों करते हो मतवाले!आशा के कितने अंकुर,मैंने हैं उर में पाले॥
विश्वास-वारि से उनको,मैंने है सींच बढ़ाए।निर्मल निकुंज में मन के,रहती हूँ सदा छिपाए॥
मेरी साँसों की लू सेकुछ आँच न उनमें आए।मेरे अंतर की ज्वालाउनको न कभी झुलसाए॥
कितने प्रयत्न से उनको,मैं हृदय-नीड़ में अपनेबढ़ते लख खुश होती थी,देखा करती थी सपने॥
इस भांति उपेक्षा मेरीकरके मेरी अवहेलातुमने आशा की कलियाँमसलीं खिलने की बेला॥
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