ग़ज़ल

राखी

सुभद्रा कुमारी चौहान · सब कलाम देखें
भैया कृष्ण ! भेजती हूँ मैंराखी अपनी, यह लो आज।कई बार जिसको भेजा हैसजा-सजाकर नूतन साज।।
लो आओ, भुजदण्ड उठाओइस राखी में बँध जाओ।भरत - भूमि की रजभूमि कोएक बार फिर दिखलाओ।।
वीर चरित्र राजपूतों कापढ़ती हूँ मैं राजस्थान।पढ़ते - पढ़ते आँखों मेंछा जाता राखी का आख्यान।।
मैंने पढ़ा, शत्रुओं को भीजब-जब राखी भिजवाई।रक्षा करने दौड़ पड़ा वहराखी - बन्द - शत्रु - भाई।।
किन्तु देखना है, यह मेरीराखी क्या दिखलाती है ।क्या निस्तेज कलाई पर हीबँधकर यह रह जाती है।।
देखो भैया, भेज रही हूँतुमको-तुमको राखी आज ।साखी राजस्थान बनाकररख लेना राखी की लाज।।
हाथ काँपता, हृदय धड़कताहै मेरी भारी आवाज़।अब भी चौक-चौक उठता हैजलियाँ का वह गोलन्दाज़।।
यम की सूरत उन पतितों कापाप भूल जाऊँ कैसे?अँकित आज हृदय में हैफिर मन को समझाऊँ कैसे?
बहिनें कई सिसकती हैं हा !सिसक न उनकी मिट पाई ।लाज गँवाई, ग़ाली पाईतिस पर गोली भी खाई।।
डर है कहीं न मार्शल-ला काफिर से पड़ जावे घेरा।ऐसे समय द्रौपदी-जैसाकृष्ण ! सहारा है तेरा।।
बोलो, सोच-समझकर बोलो,क्या राखी बँधवाओगे?भीर पडेगी, क्या तुम रक्षाकरने दौड़े आओगे?
यदि हाँ तो यह लो मेरीइस राखी को स्वीकार करो।आकर भैया, बहिन 'सुभद्रा' —के कष्टों का भार हरो।।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.