ग़ज़ल
मेरी टेक
निर्धन हों धनवान, परिश्रम उनका धन हो।निर्बल हों बलवान, सत्यमय उनका मन हो॥हों स्वाधीन गुलाम, हृदय में अपनापन हो।इसी आन पर कर्मवीर तेरा जीवन हो॥
तो, स्वागत सौ बारकरूँ आदर से तेरा।आ, कर दे उद्धार,मिटे अंधेर-अंधेरा॥
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