ग़ज़ल

प्रतीक्षा

सुभद्रा कुमारी चौहान · सब कलाम देखें
बिछा प्रतीक्षा-पथ पर चिंतितनयनों के मदु मुक्ता-जाल।उनमें जाने कितनी हीअभिलाषाओं के पल्लव पाल॥
बिता दिए मैंने कितने हीव्याकुल दिन, अकुलाई रात।नीरस नैन हुए कब करकेउमड़े आँसू की बरसात॥
मैं सुदूर पथ के कलरव में,सुन लेने को प्रिय की बात।फिरती विकल बावली-सीसहती अपवादों के आघात॥
किंतु न देखा उन्हें अभी तकइन ललचाई आँखों ने।संकोचों में लुटा दियासब कुछ, सकुचाई आँखों ने॥
अब मोती के जाल बिछाकर,गिनतीं हैं नभ के तारे।इनकी प्यास बुझाने को सखि!आएंगे क्या फिर प्यारे?
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.