ग़ज़ल
आराधना
जब मैं आँगन में पहुँची,पूजा का थाल सजाए।शिवजी की तरह दिखे वे,बैठे थे ध्यान लगाए॥
जिन चरणों के पूजन कोयह हृदय विकल हो जाता।मैं समझ न पाई, वह भीहै किसका ध्यान लगाता?
मैं सन्मुख ही जा बैठी,कुछ चिंतित सी घबराई।यह किसके आराधक हैं,मन में व्याकुलता छाई॥
मैं इन्हें पूजती निशि-दिन,ये किसका ध्यान लगाते?हे विधि! कैसी छलना है,हैं कैसे दृश्य दिखाते??
टूटी समाधि इतने ही में,नेत्र उन्होंने खोले।लख मुझे सामने हँस करमीठे स्वर में वे बोले॥
फल गई साधना मेरी,तुम आईं आज यहाँ पर।उनकी मंजुल-छाया मेंभ्रम रहता भला कहाँ पर॥
अपनी भूलों पर मन यहजाने कितना पछताया।संकोच सहित चरणों पर,जो कुछ था वही चढ़ाया॥
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.