गजानन माधव मुक्तिबोध

गजानन माधव मुक्तिबोध

1917-1964
दीवान पढ़ें (Read Diwan)

Famous Works

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगातेरी प्रत्यंचा का कम्पन सूनेपन का भार हरेगा
मुझे नहीं मालूममेरी प्रतिक्रियाएँ
जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज़ सूरजएक जॉबर-सा
स्वप्न के भीतर स्वप्न,विचारधारा के भीतर और
पता नहीं कब, कौन, कहाँ किस ओर मिलेकिस साँझ मिले, किस सुबह मिले!!
इतने प्राण, इतने हाथ, इनती बुद्धिइतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि
मैं बहुत दिनों से बहुत दिनों सेबहुत-बहुत सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना
एक पैर रखता हूँकि सौ राहें फूटतीं,
बेचैन चील!!उस जैसा मैं पर्यटनशील
शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़परित्यक्त सूनी बावड़ी
भूल-ग़लतीआज बैठी है ज़िरहबख्तर पहनकर
मुझे कदम-कदम परचौराहे मिलते हैं
मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीँ...प्रलम्बिता अंगार रेख-सा खिंचा
घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, निस्तब्ध वनंतरव्यापक अंधकार में सिकुड़ी सोयी नर की बस्ती भयकर
मेरे जीवन की धर्म तुम्ही--यद्यपि पालन में रही चूक
मैं उनका ही होता जिनसेमैंने रूप भाव पाए हैं।
मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँतुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है
रात, चलते हैं अकेले ही सितारे।एक निर्जन रिक्त नाले के पास
दीखतात्रिकोण इस पर्वत-शिखर से
विचार आते हैंलिखते समय नहीं
खगदल हैं ऐसे भी कि न जोआते हैं, लौट नहीं आते
ज़िन्दगी में जो कुछ है, जो भी हैसहर्ष स्वीकारा है;