ग़ज़ल

जब दुपहरी ज़िन्दगी पर...

गजानन माधव मुक्तिबोध · सब कलाम देखें
जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज़ सूरजएक जॉबर-साबराबर रौब अपना गाँठता-सा हैकि रोज़ी छूटने का डर हमेंफटकारता-सा काम दिन का बाँटता-सा हैअचानक ही हमें बेखौफ़ करती तबहमारी भूख की मुस्तैद आँखें हीथका-सा दिल बहादुर रहनुमाईपास पा के भीबुझा-सा ही रहा इस ज़िन्दगी के कारख़ाने मेंउभरता भी रहा पर बैठता भी तो रहाबेरुह इस काले ज़माने मेंजब दुपहरी ज़िन्दगी को रोज़ सूरजजिन्न-सा पीछे पड़ारोज़ की इस राह परयों सुबह-शाम ख़याल आते हैं...आगाह करते से हमें... ?या बेराह करते से हमें ?यह सुबह की धूल सुबह के इरादों-सीसुनहली होकर हवा में ख़्वाब लहरातीसिफ़त-से ज़िन्दगी में नई इज़्ज़त, आब लहरातीदिलों के गुम्बजों मेंबन्द बासी हवाओं के बादलों को दूर करती-सीसुबह की राह के केसरियागली का मुँह अचानक चूमती-सी हैकि पैरों में हमारे नई मस्ती झूमती-सी हैसुबह की राह पर हम सीखचों को भूल इठलातेचले जाते मिलों में मदरसों मेंफ़तह पाने के लिएक्या फ़तह के ये ख़याल ख़याल हैंक्या सिर्फ धोखा है ?...सवाल है।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.