ग़ज़ल

भूल-ग़लती

गजानन माधव मुक्तिबोध · सब कलाम देखें
भूल-ग़लतीआज बैठी है ज़िरहबख्तर पहनकरतख्त पर दिल के,चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज पत्थर सी,खड़ी हैं सिर झुकाए::सब कतारें:::बेजुबाँ बेबस सलाम में,अनगिनत खम्भों व मेहराबों-थमे::::दरबारे आम में।
सामनेबेचैन घावों की अज़ब तिरछी लकीरों से कटाचेहराकि जिस पर काँपदिल की भाप उठती है...पहने हथकड़ी वह एक ऊँचा कदसमूचे जिस्म पर लत्तरझलकते लाल लम्बे दागबहते खून केवह क़ैद कर लाया गया ईमान...सुलतानी निगाहों में निगाहें डालता,बेख़ौफ नीली बिजलियों को फैंकताखामोश !!::::सब खामोशमनसबदारशाइर और सूफ़ी,अल गजाली, इब्ने सिन्ना, अलबरूनीआलिमो फाजिल सिपहसालार, सब सरदार::::हैं खामोश !!
नामंजूरउसको जिन्दगी की शर्म की सी शर्तनामंजूर हठ इनकार का सिर तान..खुद-मुख्तारकोई सोचता उस वक्त-छाये जा रहे हैं सल्तनत पर घने साये स्याह,सुलतानी जिरहबख्तर बना है सिर्फ मिट्टी का,वो-रेत का-सा ढेर-शाहंशाह,शाही धाक का अब सिर्फ सन्नाटा !!(लेकिन, नाजमाना साँप का काटा)भूल (आलमगीर)मेरी आपकी कमजोरियों के स्याहलोहे का जिरहबख्तर पहन, खूँखारहाँ खूँखार आलीजाह,वो आँखें सचाई की निकाले डालता,सब बस्तियाँ दिल की उजाड़े डालताकरता हमे वह घेरबेबुनियाद, बेसिर-पैर..हम सब क़ैद हैं उसके चमकते तामझाम में::::शाही मुकाम में !!
इतने में हमीं में सेअजीब कराह सा कोई निकल भागाभरे दरबारे-आम में मैं भीसँभल जागाकतारों में खड़े खुदगर्ज-बा-हथियारबख्तरबंद समझौतेसहमकर, रह गए,दिल में अलग जबड़ा, अलग दाढ़ी लिए,दुमुँहेपन के सौ तज़ुर्बों की बुज़ुर्गी से भरे,दढ़ियल सिपहसालार संजीदा::::सहमकर रह गये !!
लेकिन, उधर उस ओर,कोई, बुर्ज़ के उस तरफ़ जा पहुँचा,अँधेरी घाटियों के गोल टीलों, घने पेड़ों मेंकहीं पर खो गया,महसूस होता है कि यह बेनामबेमालूम दर्रों के इलाक़े में(सचाई के सुनहले तेज़ अक्सों के धुँधलके में)मुहैया कर रहा लश्कर;हमारी हार का बदला चुकाने आयगासंकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर,हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षरप्रकट होकर विकट हो जायगा !!
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