ग़ज़ल
चाहिए मुझे मेरा असंग बबूल पन
मुझे नहीं मालूममेरी प्रतिक्रियाएँसही हैं या ग़लत हैं या और कुछसच, हूँ मात्र मैं निवेदन-सौन्दर्य
सुबह से शाम तकमन में हीआड़ी-टेढ़ी लकीरों से करता हूँअपनी ही काटपीटग़लत के ख़िलाफ़ नित सही की तलाश में किइतना उलझ जाता हूँ किजहर नहींलिखने की स्याही में पीता हूँ किनीला मुँह...दायित्व-भावों की तुलना मेंअपना ही व्यक्ति जब देखतातो पाता हूँ किखुद नहीं मालूमसही हूँ या गलत हूँया और कुछ
सत्य हूँ कि सिर्फ मैं कहने की तारीफमनोहर केन्द्र मेंखूबसूरत मजेदारबिजली के खम्भे परअँगड़ाई लेते हुए मेहराबदार चारतड़ित-प्रकाश-दीप...खम्भे के अलंकार!!
सत्य मेरा अलंकार यदि, हायतो फिर मैं बुरा हूँ.निजत्व तुम्हारा, प्राण-स्वप्न तुम्हारा औरव्यक्तित्व तड़ित्-अग्नि-भारवाही तार-तारबिजली के खम्भे की भांति हीकन्धों पर रख मैंविभिन्न तुम्हारे मुख-भाव कान्ति-रश्मि-दीपनिज के हृदय-प्राणवक्ष से प्रकट, आविर्भूत, अभिव्यक्तयदि करता हूँ तो....दोष तुम्हारा है
मैंने नहीं कहा था किमेरी इस जिन्दगी के बन्द किवार कीदरार सेरश्मि-सी घुसो और विभिन्न दीवारों पर लगे हुए शीशों परप्रत्यावर्तित होती रहोमनोज्ञ रश्मि की लीला बनहोती हो प्रत्यावर्तित विभिन्न कोणों सेविभिन्न शीशों परआकाशीय मार्ग से रश्मि-प्रवाहों केकमरे के सूने में सांवलेनिज-चेतस् आलोक
सत्य है किबहुत भव्य रम्य विशाल मृदुकोई चीज़कभी-कभी सिकुड़ती है इतनी कितुच्छ और क्षुद्र ही लगती है!!मेरे भीतर आलोचनाशील आँखबुद्धि की सचाई सेकल्पनाशील दृग फोड़ती!!
संवेदनशील मैं कि चिन्ताग्रस्तकभी बहुत कुद्ध होसोचता हूँमैंने नहीं कहा था कि तुम मुझेअपना सम्बल बना लोमुझे नहीं चाहिए निज वक्ष कोई मुखकिसी पुष्पलता के विकास-प्रसार-हितजाली नहीं बनूंगा मैं बांस कीजाहिए मुझे मैंचाहिए मुझे मेरा खोया हुएरूखा सूखा व्यक्तित्व
चाहिए मुझे मेरा पाषाणचाहिए मुझे मेरा असंग बबूलपनकौन हो की कही की अजीब तुमबीसवीं सदी की एकनालायक ट्रैजेडी
जमाने की दुखान्त मूर्खताफैन्टेसी मनोहरबुदबुदाता हुआ आत्म संवादहोठों का बेवकूफ़ कथ्य और
फफक-फफक ढुला अश्रुजल
अरी तुम षडयन्त्र-व्यूह-जाल-फंसी हुईअजान सब पैंतरों से बातों सेभोले विश्वास की सहजतास्वाभाविक सौंपयह प्राकृतिक हृदय-दानबेसिकली गलत तुम।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.