ग़ज़ल

बाँहें फैलाए रोज़ मिलती हैं सौ राहें

गजानन माधव मुक्तिबोध · सब कलाम देखें
एक पैर रखता हूँकि सौ राहें फूटतीं,व मैं उन सब पर से गुज़रना चाहता हूँ;बहुत अच्छे लगते हैंउनके तज़ुर्बे और अपने सपने...सब सच्चे लगते हैं;अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,जाने क्या मिल जाए !!
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर मेंचमकता हीरा है;हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है,प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है,मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी मेंमहाकाव्य पीड़ा है,पलभर में सबसे गुज़रना चाहता हूँ,प्रत्येक उर में से तिर जाना चाहता हूँ,इस तरह ख़ुद ही को दिए-दिए फिरता हूँ,अजीब है ज़िन्दगी !!
बेवकूफ़ बनने की ख़ातिर हीसब तरफ़ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ;और यह सब देख बड़ा मज़ा आता हैकि मैं ठगा जाता हूँ...हृदय में मेरे ही,प्रसन्न-चित्त एक मूर्ख बैठा हैहँस-हँसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,कि जगत्...स्वायत्त हुआ जाता है ।
विज्ञापनकहानियाँ लेकर औरमुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलतेजहाँ ज़रा खड़े होकरबातें कुछ करता हूँ......उपन्यास मिल जाते ।
दुख की कथाएँ, तरह-तरह की शिकायतेंअहंकार-विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान,ज़माने के जानदार सूरे व आयतेंसुनने को मिलती हैं !
कविताएँ मुसकरा लाग-डाँट करती हैँप्यार बात करती हैं।मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियाँश्रद्धाएँ चढ़ती हैं !!
घबराए प्रतीक और मुसकाते रूप-चित्रलेकर मैं घर पर जब लौटता...उपमाएँ, द्वार पर आते ही कहती हैं किसौ बरस और तुम्हेंजीना ही चाहिए ।
घर पर भी, पग-पग पर चौराहे मिलते हैं,बाँहें फैलाए रोज़ मिलती हैं सौ राहें,शाखा-प्रशाखाएँ निकलती रहती हैं,नव-नवीन रूप-दृश्यवाले सौ-सौ विषयरोज़-रोज़ मिलते हैं...और, मैं सोच रहा किजीवन में आज के लेखक की कठिनाई यह नहीं किकमी है विषयों कीवरन् यह आधिक्य उनका हीउसको सताता है,और, वह ठीक चुनाव कर नहीं पाता है !!
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.