ग़ज़ल
मृत्यु और कवि
घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, निस्तब्ध वनंतरव्यापक अंधकार में सिकुड़ी सोयी नर की बस्ती भयकरहै निस्तब्ध गगन, रोती-सी सरिता-धार चली गहराती,जीवन-लीला को समाप्त कर मरण-सेज पर है कोई नरबहुत संकुचित छोटा घर है, दीपालोकित फिर भी धुंधला,वधू मूर्छिता, पिता अर्ध-मृत, दुखिता माता स्पंदन-हीनघनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, कवि का मन गीला"ये सब क्षनिक, क्षनिक जीवन है, मानव जीवन है क्षण-भंगुर" ।
ऐसा मत कह मेरे कवि, इस क्षण संवेदन से हो आतुरजीवन चिंतन में निर्णय पर अकस्मात मत आ, ओ निर्मल !इस वीभत्स प्रसंग में रहो तुम अत्यंत स्वतंत्र निराकुलभ्रष्ट ना होने दो युग-युग की सतत साधना महाआराधनाइस क्षण-भर के दुख-भार से, रहो अविचिलित, रहो अचंचलअंतरदीपक के प्रकाश में विणत-प्रणत आत्मस्य रहो तुम
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