ग़ज़ल
मुझे पुकारती हुई पुकार
मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीँ...प्रलम्बिता अंगार रेख-सा खिंचाअपार चर्मवक्ष प्राण कापुकार खो गई कहीं बिखेर अस्थि के समूहजीवनानुभूति की गभीर भूमि में।अपुष्प-पत्र, वक्र-श्याम झाड़-झंखड़ों-घिरे असंख्य ढूहभग्न निश्चयों-रुंधे विचार-स्पप्न-भाव केमुझे दिखेअपूर्त सत्य की क्षुधितअपूर्ण यत्न की तृषितअपूर्त जीवनानुभूति-प्राणमूर्ति की समस्त भग्नता दिखी(कराह भर उठा प्रसार प्राण का अजब)समस्त भग्नता दिखीकि ज्यों विरक्त प्रान्त मेंउदास-से किसी नगरसटर-पटरमलीन, त्यक्त, ज़ंग-लगे कठोर ढेर--भग्न वस्तु के समूहचिलचिल रहे प्रचण्ड धूप में उजाड़...दिख गए कठोर स्याह(घोर धूप में) पहाड़कठिन-सत्त्व भावना नपुंसका असंज्ञ केमुझे दिखी विराट् शून्यता अशान्त काँपतीकि इस उजाड़ प्रान्त के प्रसार में रही चमक।रहा चमक प्रसार...फाड़ श्याम-मृत्तिका-स्तरावरण उठे सकोणप्रस्तरी प्रतप्त अंग यत्र-तत्र-सर्वतःकि ज्यों ढँकी वसुन्धरा-शरीर की समस्त अस्थियाँ खुलींरहीं चमक कि चिलचिला रही वहाँअचेत सूर्य की सफ़ेद औ' उजाड़ धूप में।समीरहीन ख़ैबरीअशान्त घाटियों गई असंग राहशुष्क पार्वतीय भूमि के उतार औ' उठान की निरर्थउच्चता निहारती चली वितृष्ण दृष्टि से(कि व्यर्थ उच्चता बधिर असंज्ञ यह)उजाड़ विश्व की कि प्राण कीइसी उदास भूमि में अचक जगामुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं।
दरार पड़ गई तुरत गभीर-दीर्घप्राण की गहन धरा प्रतप्त केअनीर श्याम मृत्तिका शरीर में।कि भाव स्वप्न-भार मेंपुकार के अधीर व्यग्र स्पर्श से बिलख उठेतिमिर-विविर में पड़ी अशान्त नागिनी--छिपी हुई तृषाअपूर्त स्वप्न-लालसातुरत दिखीकि भूल-चूक धवंसिनी अवावृता हुई।पुकार ने समस्त खोल दी छिपी प्रवंचनाकहा कि शुष्क है अथाह यह कुआँकि अन्धकार-अन्तराल में लगेमहीन श्याम जालघृण्य कीट जो कि जोड़ते दीवाल को दीवाल सेव अन्तराल को तलाअमानवी कठोर ईंट-पत्थरों से भरा हुआन नीर है, न पीर है, मलीन हैसदा विशून्य शुष्क ही कुआँ रहा।
विराट् झूठ के अनन्त छन्द-सीभयावनी अशान्त पीत धुन्ध-सीसदा अगेयगोपनीय द्वन्द्व-सी असंग जो अपूर्त स्वप्न-लालसाप्रवेग में उड़े सुतिक्ष्ण बाण परअलक्ष्य भार-सी वृथाजगा रही विरूप चित्र हार कासधे हुए निजत्व की अभद्र रौद्र हार-सी।मैं उदास हाथ मेंहार की प्रत्प्त रेत मल रहानिहारता हुआ प्रचण्ड उष्ण गोल दूर के क्षितिज।
शून्य कक्ष की उदासश्वासहीन, पीत-वायु शान्ति मेंदिवाल परसचेष्ट छिपकलीअजान शब्द-शब्द ज्यों करेकि यों अपार भाव स्वप्न-भार येप्रशान्ति गाढ़ मेंप्रशान्ति गाढ़ सेप्रगाढ़ होसमस्त प्राण की कथा बखानतेअधीर यन्त्र-वेग से अजीब एकरूप-तानशब्द, शब्द, शब्द में।
मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं...आज भी नवीन प्रेरणा यहाँ न मर सकी,न जी सकी, परन्तु वह न डर सकी।घनान्धकार के कठोर वक्षदंश-चिह्न-सेगभीर लाल बिम्ब प्राण-ज्योति केगभीर लाल इन्दु-सेसगर्व भीम शान्ति में उठे अयास मुसकराघनान्धकार के भुजंग-बन्ध दीर्घ साँवरेविनष्ट हो गएप्रबुद्ध ज्वाल में हताश हो।विशाल भव्य वक्ष सेबही अनन्त स्नेह की महान् कृतिमयी व्यथाबही अशान्त प्राण से महान् मानवी कथा।किसी उजाड़ प्रान्त केविशाल रिक्त-गर्भ गुम्बजों-घिरेविहंग जोअधीर पंख फड़फड़ा दिवाल परसहायहीन, बद्ध-देह, बद्ध-प्राणहारकर न हारतेअरे, नवीन मार्ग पा खुला हुआतुरन्त उड़ गए सुनील व्योम में अधीर हो।मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई वहींसँवारती हुई मुझेउठी सहास प्रेरणा।प्रभात भैरवी जगी अभी-अभी।
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