ग़ज़ल
मैं उनका ही होता
मैं उनका ही होता जिनसेमैंने रूप भाव पाए हैं।वे मेरे ही हिये बंधे हैंजो मर्यादाएँ लाए हैं।
मेरे शब्द, भाव उनके हैंमेरे पैर और पथ मेरा,मेरा अंत और अथ मेरा,ऐसे किंतु चाव उनके हैं।
मैं ऊँचा होता चलता हूँउनके ओछेपन से गिर-गिर,उनके छिछलेपन से खुद-खुद,मैं गहरा होता चलता हूँ।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.