दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार

1933-1975
दुष्यंत कुमार त्यागी एक लोकप्रिय हिन्दी कवि और गजलकार थे।
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Famous Works

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहींमेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाएतेरी सहर हो मेरा आफ़ताब हो जाए
"खँडहरों सी भावशून्य आँखेंनभ से किसी नियंता की बाट जोहती हैं।
मुझे स्वीकार हैं वे हवाएँ भीजो तुम्हें शीत देतीं
अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ,तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ ।
अफ़वाह है या सच है ये कोई नही बोलामैंने भी सुना है अब जाएगा तेरा डोला
अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरारघर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार
जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,अब तो पथ यही है|
आज वीरान अपना घर देखातो कई बार झाँक कर देखा
आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पाँवों से सिर तक जैसे एक जनूनबेतरतीबी से बढ़े हुए नाख़ून
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
इस मोड़ से तुम मुड़ गई फिर राह सूनी हो गई।मालूम था मुझको कि हर धारा नदी होती नहीं
(बस्तर गोलीकांड पर एक प्रतिक्रिया)मैंने चाहा था
किन्तु जो तिमिर-पानऔ' ज्योति-दान
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।भावना की गोद से उतर कर
एक कबूतर चिठ्ठी ले कर पहली—पहली बार उड़ामौसम एक गुलेल लिये था पट—से नीचे आन गिरा
एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान हैआज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है
कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लियेकहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये
किसी को क्या पता था इस अदा पर मर मिटेंगे हमकिसी का हाथ उठ्ठा और अलकों तक चला आया
कौन यहाँ आया थाकौन दिया बाल गया
"आह!मेरा पाप-प्यासा तन
एक अन्धकार बरसाती रात मेंबर्फ़ीले दर्रों-सी ठंडी स्थितियों में
घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुँचती हैएक नदी जैसे दहानों तक पहुँचती है
आजकल मैं सोचता हूँ साँपों से बचने के उपायरात और दिन
ज़िंदगानी का कोई मक़सद नहीं हैएक भी क़द आज आदमक़द नहीं है
जाने किस—किसका ख़्याल आया हैइस समंदर में उबाल आया है
याद आता है कि मैं हूँ शंकरन या मंकरनआप रुकिेए फ़ाइलों में देख आता हूँ मैं
सब बियाबान, सुनसान अँधेरी राहों मेंखंदकों खाइयों में
तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बराअब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा
तुमने इस तालाब में रोहू पकड़ने के लिएछोटी—छोटी मछलियाँ चारा बनाकर फेंक दीं
तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहींकमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं
गडरिए कितने सुखी हैं ।न वे ऊँचे दावे करते हैं
तूने ये हरसिंगार हिलाकर बुरा कियापांवों की सब जमीन को फूलों से ढंक लिया
संस्कारों की अरगनी पर टंगाएक फटा हुआ बुरका
सद्यस्नात तुमजब आती हो