ग़ज़ल
उसे क्या कहूँ
किन्तु जो तिमिर-पानऔ' ज्योति-दानकरता करता बह गयाउसे क्या कहूँकि वह सस्पन्द नहीं था ?
और जो मन की मूक कराहज़ख़्म की आहकठिन निर्वाहव्यक्त करता करता रह गयाउसे क्या कहूँगीत का छन्द नहीं था ?
पगों कि संज्ञा में हैगति का दृढ़ आभास,किन्तु जो कभी नहीं चल सकादीप सा कभी नहीं जल सकाकि यूँही खड़ा खड़ा ढह गयाउसे क्या कहूँजेल में बन्द नहीं था ?
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