ग़ज़ल
घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुंचती है
घंटियों की आवाज़ कानों तक पहुँचती हैएक नदी जैसे दहानों तक पहुँचती है
अब इसे क्या नाम दें, ये बेल देखो तोकल उगी थी आज शानों तक पहुँचती है
खिड़कियां, नाचीज़ गलियों से मुख़ातिब हैअब लपट शायद मकानों तक पहुँचती है
आशियाने को सजाओ तो समझ लेना,बरक कैसे आशियानों तक पहुँचती है
तुम हमेशा बदहवासी में गुज़रते हो,बात अपनों से बिगानों तक पहुँचती है
सिर्फ़ आंखें ही बची हैं चँद चेहरों मेंबेज़ुबां सूरत, जुबानों तक पहुँचती है
अब मुअज़न की सदाएं कौन सुनता हैचीख़-चिल्लाहट अज़ानों तक पहुँचती है
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