ग़ज़ल

अपनी प्रेमिका से

दुष्यंत कुमार · सब कलाम देखें
मुझे स्वीकार हैं वे हवाएँ भीजो तुम्हें शीत देतींऔर मुझे जलाती हैंकिन्तुइन हवाओं को यह पता नहीं हैमुझमें ज्वालामुखी हैतुममें शीत का हिमालय है।
फूटा हूँ अनेक बार मैं,पर तुम कभी नहीं पिघली हो,अनेक अवसरों पर मेरी आकृतियाँ बदलींपर तुम्हारे माथे की शिकनें वैसी ही रहींतनी हुई.तुम्हें ज़रूरत है उस हवा कीजो गर्म होऔर मुझे उसकी जो ठण्डी!
फिर भी मुझे स्वीकार है यह परिस्थितिजो दुखाती हैफिर भी स्वागत है हर उस सीढ़ी काजो मुझे नीचे, तुम्हें उपर ले जाती हैकाश! इन हवाओं को यह सब पता होता।
तुम जो चारों ओरबर्फ़ की ऊँचाइयाँ खड़ी किए बैठी हो(लीन... समाधिस्थ)भ्रम में हो।
अहम् है मुझमें भीचारों ओर मैं भी दीवारें उठा सकता हूँलेकिन क्यों?मुझे मालूम हैदीवारों कोमेरी आँच जा छुएगी कभीऔर बर्फ़ पिघलेगीपिघलेगी!
मैंने देखा है(तुमने भी अनुभव किया होगा)मैदानों में बहते हुए उन शान्त निर्झरों कोजो कभी बर्फ़ के बड़े-बड़े पर्वत थेलेकिन जिन्हें सूरज की गर्मी समतल पर ले आई।
देखो ना!मुझमें ही डूबा था सूर्य कभी,सूर्योदय मुझमें ही होना है,मेरी किरणों से भी बर्फ़ को पिघलना है,इसीलिए कहता हूँ-अकुलाती छाती से सट जाओ,क्योंकि हमें मिलना है।
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