ग़ज़ल

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दुष्यंत कुमार · सब कलाम देखें
याद आता है कि मैं हूँ शंकरन या मंकरनआप रुकिेए फ़ाइलों में देख आता हूँ मैं
हैं ये चिंतामन अगर तो हैं ये नामों में भ्रमितइनको दारु की ज़रूरत है ये बतलाता हूँ मैं
मार खाने की तबियत हो तो भट्टाचार्य कीगुलगुली चेहरा उधारी मांग कर लाता हूँ मैं
इनका चेहरा है कि हुक्का है कि है गोबर-गणेशकिस कदर संजीदगी यह सबको समझाता हूँ मैं
उस नई कविता पे मरती ही नहीं हैं लड़कियाँइसलिये इस अखाड़े में नित गज़ल गाता हूँ मैं
कौन कहता है निगम को और शिव को आदमीये बड़े शैतान मच्छर हैं ये समझाता हूँ मैं
ये सुमन उज्जैन का है इसमें खुशबू तक नहींदिल फ़िदा है इसकी बदबू पर कसम खाता हूँ मैं
इससे ज्यादा फ़ितरती इससे हरामी आदमीहो न हो दुनिया में पर उज्जैन में पाता हूँ मैं
पूछते हैं आप मुझसे उसका हुलिया, उसका हालभगवती शर्मा को करके फ़ोन बुलवाता हूँ मैं
वो अवंतीलाल अब धरती पे चलता ही नहींएक गुटवारे-सी उसकी शख़्सियत पाता हूँ मैं
सबसे ज़्यादा कीमती चमचा हूँ मैं सरकार कानाम है मेरा बसंती, राव कहलाता हूँ मैं
प्यार से चाहे शरद की मार लो हर एक गोटवैसे वो शतरंज का माहिर है, बतलाता हूँ मैं
(रचनाकाल : 1 अप्रैल 1975 के करीब)
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