ग़ज़ल

दो पोज़

दुष्यंत कुमार · सब कलाम देखें
सद्यस्नात तुमजब आती होमुख कुन्तलों से ढँका रहता हैबहुत बुरे लगते हैं वे क्षण जबराहू से चाँद ग्रसा रहता है ।
पर जब तुमकेश झटक देती हो अनायासतारों-सी बूँदेंबिखर जाती हैं आसपासमुक्त हो जाता है चाँदतब बहुत भला लगता है ।
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