ग़ज़ल
अपाहिज व्यथा
अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ,तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ ।
ये दरवाज़ा खोलो तो खुलता नहीं है,इसे तोड़ने का जतन कर रहा हूँ ।
अँधेरे में कुछ ज़िन्दगी होम कर दी,उजाले में अब ये हवन कर रहा हूँ ।
वे सम्बन्ध अब तक बहस में टँगे हैं,जिन्हें रात-दिन स्मरण कर रहा हूँ ।
तुम्हारी थकन ने मुझे तोड़ डाला,तुम्हें क्या पता क्या सहन कर रहा हूँ ।
मैं अहसास तक भर गया हूँ लबालब,तेरे आँसुओं को नमन कर रहा हूँ ।
समालोचको की दुआ है कि मैं फिर,सही शाम से आचमन कर रहा हूँ ।
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