ग़ज़ल
कौन यहाँ आया था
कौन यहाँ आया थाकौन दिया बाल गयासूनी घर-देहरी मेंज्योति-सी उजाल गया
पूजा की बेदी परगंगाजल भरा कलशरक्खा था, पर झुक करकोई कौतुहलवशबच्चों की तरह हाथडाल कर खंगाल गया
आँखों में तिरा आयासारा आकाश सहजनए रंग रँगा थका-हारा आकाश सहजपूरा अस्तित्व एकगेंद-सा उछाल गया
अधरों में राग, आगअनमनी दिशाओं मेंपार्श्व में, प्रसंगों मेंव्यक्ति में, विधाओं मेंसाँस में, शिराओं मेंपारा-सा ढाल गया|
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh