ग़ज़ल

तुलना

दुष्यंत कुमार · सब कलाम देखें
गडरिए कितने सुखी हैं ।
न वे ऊँचे दावे करते हैंन उनको ले करएक दूसरे को कोसते या लड़ते-मरते हैं।जबकिजनता की सेवा करने के भूखेसारे दल भेडियों से टूटते हैं ।ऐसी-ऐसी बातेंऔर ऐसे-ऐसे शब्द सामने रखते हैंजैसे कुछ नहीं हुआ हैऔर सब कुछ हो जाएगा ।
जबकिसारे दलपानी की तरह धन बहाते हैं,गडरिए मेंड़ों पर बैठे मुस्कुराते हैं... भेडों को बाड़े में करने के लिएन सभाएँ आयोजित करते हैंन रैलियाँ,न कंठ खरीदते हैं, न हथेलियाँ,न शीत और ताप से झुलसे चेहरों परआश्वासनों का सूर्य उगाते हैं,स्वेच्छा सेजिधर चाहते हैं, उधरभेड़ों को हाँके लिए जाते हैं ।
गडरिए कितने सुखी हैं ।
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